ओबीसी जातियों के बौद्ध धम्म प्रवेश की कहानी, सत्यशोधक ओबीसी परिषद की जुबानी

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शब्दांकन: अविनाश दाभाडे
२५ दिसम्बर, २०१६ को दीक्षाभूमि नागपुर में हजारों की संख्या में हिंदू ओ. बी. सी. लोगों ने सामूहिक तौर पर धर्मान्तरण कर बौद्ध धम्म अपनाया. इस क्रन्तिकारी घटना के पीछे सत्यशोधक ओबीसी परिषद के संस्थापक दिवंगत आयु. हनुमंतराव उपरे काका एवं अपने पिता का संकल्प उनके मृत्यु उपरांत पूरा करने वाले आयु. संदीप हनुमंतराव उपरे तथा उनके सहयोगीयों के अथक प्रयास थे. प्रस्तुत धर्मान्तरण कई मायनों में महत्वपूर्ण है जिसके भारतीय समाजजीवन पर दूरगामी परिणाम होते हुए दिखाई देंगे.

इस ऐतिहासिक धम्म प्रवेश बाबत अपनी भूमिका सत्यशोधक ओबीसी परिषद द्वारा प्रसिद्ध कि गई है, उसके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत है.
सबसे पहले उन्होंने ओबीसी भाइयों से कुछ तार्किक एवं विचारनीय सवाल पूछे है;
१. क्या सही मायनों में ओबीसी जातियों की प्रगति हो गई है?
२. भारत में ५२% ओबीसी के लिए सिर्फ २७% आरक्षण क्यों? ओबीसी का हक़ कौन मार रहा है?
३. जिनकी संख्या केवल ४ से ५% है वह सवर्ण हिंदू सभी क्षेत्रों में करीबन ९०% जगहों पर क्यों और कैसे विराजमान है? सवर्णों के अतिरिक्त बचे हुए ९५% लोग कौनसी गहरी नींद में है? क्या उन्हें कोई नींद की दवाइयां दी गई है?
४. प्रगति के लिए मारक अंधविश्वास, होमहवन, कर्मकांड, अध्यात्म आदि विषयों में ही उन्हें साल के ३६५ दिन व्यस्त रहना पड़े ऐसी सटीक व्यवस्था किसने बनाये रखी है?
५. मंडल कमीशन का विरोध कौन कर रहा था और उसके खिलाफ न्यायालय में कौन गया? विरोध करनेवालों में मुस्लिम, ख्रिश्चन,पारसी, या बौद्ध इनमे से कोई भी क्यों नहीं था? ‘ गर्व से कहो हम हिंदू है’ ऐसा भ्रामक नारा लगाने वाले हमेशासे मंडल कमीशन और ओबीसी जनगणना का विरोध क्यों करते आये है?

आगे उन्होंने विवेचन किया है कि, चातुर्वर्ण्य पद्धति नुसार ओबीसी जातिया शुद्र मानी जाती है. तथा ‘शुद्र मतलब दलित’ यह भ्रामक कल्पना जानबूझकर प्रसारित कि गई है. हिंदू धर्मशास्त्रानुसार इन शूद्रों को मतलब ओबीसी लोगों को हिंदू धर्म में जरा भी प्रतिष्ठा नहीं है. शिक्षा और संपत्ति का कोई भी अधिकार उन्हें नहीं दिया गया. उनका पीढ़ी दर पीढ़ी का कार्य केवल आवश्यक वस्तुओं का उत्पाद करना और सवर्णों की बगैर कोई किन्तु परन्तु किये सेवा करना. धर्मशास्त्रानुसार यही उनका धर्म था. इस दायरे के बाहर जाना उनके लिए पाप था. इच्छा, आकांक्षा, इन्टरेस्ट आदि मानवीय भावनाओं के लिए वहा कोई जगह नहीं थी. कोई इस दायरे को अगर तोडना चाहे तो उसको सीधे नरक में जाना होता था. नरक में जाने का डर हमेशा उसके सर के ऊपर टांगकर रखा गया था. इस डर के साथ जीना ही धर्मं का पालन कहलाता था. इस तरह के धर्म संस्कार ओबीसी लोगों पर जन्म से लेकर मृत्यु तक होते रहने के कारण वह सत्ता, संपत्ति तथा प्रतिष्ठाविहीन हो चुके है. इस तरह वैदीकों द्वारा यहाँ के भूमिपुत्रों को गुलाम बना दिया गया और वह भूमिपुत्र भी अपनी गुलामी का आनंद मनाते रहे और अपनी गुलामी को ही अपना पवित्र धर्म मानते रहे.

हमारा देश स्वतंत्र हो चूका है लेकिन स्वतंत्रता के मीठे फल अभीतक ओबीसी जातीयों को नसीब नहीं हुए है. इस देश में जहा एकतरफ ओबीसी हिंदू कहलाता है वही दूसरी तरफ हिंदू धर्मग्रन्थ ओबीसी का स्थान शुद्र, और हीन दर्शाता है. तन मन धन से ओबीसी हिंदू धर्म के कर्मकांड, धर्म का पालन पोषण बखूबी निभाता है लेकिन उसी धर्म के ठेकेदार उसके संविधानिक हक़ और हितों में खुलेआम बाधाए उत्पन्न करते है. एक अजीब कैंची में आज ओबीसी फंसे हुए है. इससे मुक्ति का मार्ग खोजना होगा. केवल संविधान का प्रमाण पर्याप्त नहीं होगा. क्योंकि संविधान सार्वजनिक जीवन से संबंधित है. तो फिर व्यक्तिगत जीवन में क्या प्रमाण होना चाहिए, कौनसी जीवन निष्ठाओं के साथ इंसान ने जीना चाहिए? यह प्रश्न फिर भी बरक़रार है और इस प्रश्न के उत्तर में संविधान भी मौन है. हाँ, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर खोजने की जिम्मेदारी संविधान ने व्यक्ति को सौंपी है और यह जिम्मेदारी हर व्यक्ति बखूबी निभायेगा यह संविधान का दृढ़ विश्वास है. व्यक्तिगत जीवन में व्यक्ति की धारणाए कौनसी हो , कौनसे जीवनमूल्य आधारभूत हो, व्यक्तिगत जीवन कैसे आगे बढाया जाये इसपर विचार हर व्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर पर ही करना होगा. धर्म का विकल्प केवल धर्म ही होता है और संस्कृति का विकल्प संस्कृति. इसलिए स्वतंत्रता,समता, बंधुता, न्याय, विज्ञाननिष्ठा जैसे सर्वोपरी सुंदर एवं संविधान सुसंगत नितिमूल्यों का पुरस्कार करनेवाली धर्मसंस्कृति का पता खोजना होगा! ओबीसी जातीयों के समग्र उत्थान का बस यही एक मार्ग है!

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