नायकपूजा और डॉ. आंबेडकर

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बाबासाहब डॉ.भीमराव आंबेडकर द्वारा दिया गया ‘रानडे, गाँधी और जीना ’ यह विश्वप्रसिध्द भाषण अनेक मायनों में आज भी प्रासंगिक है. आज भारतीय परिपेक्ष में हर क्षेत्र में व्याप्त जो नायक पूजा दिखाई देती है उसके तारतम्य में इस भाषण का परिपाठ आज पुनः एकबार आवश्यक है.

नायकपूजा और देशसेवा भिन्न :

प्रचलित दौर में इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति के विचार एवं कृतियों पर अपनी छाप छोड़ी हुई है. परिस्थिति तो यहाँ तक पहुँच चुकी है कि लोगों को आज मनन या चिंतन करने कि भी आवश्यकता न पड़े. लोगों के विचार भी मीडिया द्वारा संचालित होते दिखाई दे रहे है. मीडिया की इस व्याप्ति के कारण नायकपूजा भारतीय जनमानस का एक अभिन्न अंग बनकर रह गयी है. मिसाल के तौर पर यह नायकपूजा नरेन्द्र मोदीजी के रूप में जैसे राजनीती में दृष्टिगत है वैसेही खेल जगत में सचिन तेंदुलकर के रूप में देखी जा सकती है. जैसे फिल्मों में अमिताभ बच्चन की नायकपूजा होती है वैसेही अन्ना हजारे का लिबास पहने वह  झूठमूठ की समाजनीति में भी दिखाई देती है. ऐसी नायकपूजा को आड़े हाथों लेते हुए डॉ. आंबेडकर ने भारतीय मानसिकता को उजागर कर उससे होनेवाले संभावित खतरों से भारतीय जनता को आगाह करते हुए कहा था, “मै आशा करता हूँ कि व्यक्ति से ऊपर देश होता है, यह बात मेरे भारतीय बंधुओं को एक न एक दिन समझ में आ जाएगी क्यूंकि देशसेवा और गाँधी एवं जीना की पूजा यह दोनों बाते भिन्न है.”

महामानव कौन कहलाता है :

सिकंदर, अत्तिला, सीज़र, तैमुरलंग जैसे अनेक योध्दाओं को उल्लेखित कर डॉ. आंबेडकर यह बताते है की ऐसे पुरुषों का दीर्घकालीन प्रभाव बहुत ही कम मात्रा में परिलक्षित होता है. क्यूंकि सामाजिक पुनर्रचना करने या उसमे नई चेतना प्रवाहित करने हेतु ऐसे पुरुष किसी  भी रसायन का निर्माण नहीं करते.

महामानवों को पहचानने हेतु कुछ कसौटिया डॉ. आंबेडकर उध्दृत करते है जैसे कि सत्यनिष्ठा, उच्च नैतिक एवं बौध्दिक गुण. इन सभी कसौटियों की चर्चा करते हुए बाबासाहब हमारा ध्यान एक महत्वपूर्ण प्रश्न की और खिंच लेते है वो प्रश्न है, महान(Great)व्यक्ति और प्रसिध्द (Eminent) व्यक्ति में क्या अंतर है? इस प्रश्न पर गहन विमर्श उपरांत बाबासाहब उत्तर देते है कि जो व्यक्ति प्रत्यक्ष कृति कर  समाज परिवर्तन का कार्य करता हो या उसके लिए लोगों को प्रेरित करता हो केवल वो ही व्यक्ति महान कहलाता है.

गुरुशिष्य परंपरा पर भाष्य:

बाबासाहब कहते है कि महान व्यक्ति  कभी भी स्वयं के विचार या निर्णय औरों पर थोपता नहीं तथा अपने अनुयायियों को बुध्दिभ्रष्ट कर अपना कार्य नहीं करता. अपितु, महान व्यक्ति हमेशा अपने अनुयायियों को स्फूर्ति प्रदान कर उन्हें जागृत करता है. उनमे नई उर्जा का संचारण कर उनमे छिपी हुई प्रतिभा को निखारता है. आगे बाबासाहब प्रतिपादन करते है कि गुरु के विचार या निर्णय शिष्यों पर बंधनकारक होना यह बात गुरु एवं शिष्य दोनों के हित के दृष्टिकोण से गलत है.

वर्तमान भारत अनेक समस्याओं से ग्रसित है. विषमतामूलक समाज का समर्थन करनेवाली विचारधारा आज सत्तासीन है. वैश्विकीकरण से उपजी समस्याएं, सामन्तवाद, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता,संस्थात्मक शोषण एवं सस्थात्मक हिंसा, चरमपंथियों द्वारा किया जा रहा उन्माद, आदि समस्याओं से पूरा देश  व्याप्त है. समाज सुधारकों के साथ लोग खड़े न होकर राजनीती करने वालों के पीछे भीड़ बनाये फिरते है. बाबासाहब का भीड़ वाला यह निरिक्षण आज भी हम तृप्ति देसाई या कन्हैया कुमार के उदहारण से समझ सकते है.

बाबासाहब द्वारा दिया गया ‘रानडे, गाँधी और जीना’ यह भाषण अनेक अर्थों से आज भी प्रासंगिक है. वर्तमान परिस्थिति का सही आकलन करने एवं भविष्य में सही दिशा में मार्गक्रमण करने हेतु यह भाषण एक पथदर्शक के रूप में हर संवेदनशील व्यक्ति द्वारा पढ़ा जाना आवश्यक है.

साभार: सतीश बनसोडे

हिंदी अनुवाद: अविनाश दाभाडे

 

 

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