बहुजनों के थिंक टैंक “बामसेफ” के संस्थापक : यशकाई डी. के. खापर्डे

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बामसेफ संगठन के संस्थापको मे से एक यशकाई डी. के. खापर्डे का जन्म 13 मई 1939 को नागपुर (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनकी पूरी शिक्षा नागपुर में ही हुई थी। पढाई के बाद उन्होंने डिफेन्स में नौकरी ज्वाइन कर ली थी। नौकरी के दौरान जब वे पुणे में थे, तभी माननीय दीना भाना और मान्यवर कांशीराम उनके सम्पर्क में आये। खापर्डे साहब ने ही मान्यवर कांशीराम को डा. आंबेडकर और उनके आन्दोलन के बारे में विस्तृत रूप से बताया था और बाबा साहब की लिखी प्रसिद्ध पुस्तक जाति भेद का उच्छेद (Annihilation of Caste) पढ़ने के लिए दी। इन तीनों महापुरुषों ने समाज के अन्य जागरुक साथियो के साथ मिल कर विचार किया कि अनुसूचित जतियों/ अनुसूचित जन जतियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग और उनसे धर्मांतरित अल्पसंख्यक समाज का अखिल भारतीय स्तर पर एक ‘थिंक टेंक’ होना चाहिए जिसमें इस समाज के नौकरी पेशा कर्मचारी और अधिकारी हों और जो लम्बी प्लानिंग के साथ मूलनिवासी बहुजन समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए, ‘फुले-अम्बेडकरी विचारधारा’ के तहत सामाजिक चेतना का काम करे। इसी के तहत ये तीन महापुरुषो ने समाज के और जागरूक साथियों के साथ मिलकर समाज की गैर राजनैतिक जड़े अर्थात सामाजिक जडे मजबूत करने के लिए बामसेफ की अवधारणा 6 दिसम्बर 1973 को पूना मे किया और 6 दिसम्बर 1978 को दिल्ली मे इसे मूर्त रूप दिया और तय किया कि “बामसेफ को समाज के दिमाग (Brain) का काम करना चाहिए और समाज से गाइड होने के बजाय उन्हे समाज को गाइड करना चाहिए”।
बाद मे इसी संगठन से 1981 मे डीएस-4 का जन्म हुआ। इसके बाद मान्यवर कांशी राम ने 1984 राजनीति के क्षेत्र मे कदम रखा और तब खापर्डे साहब और मान्यवर कांशीराम मे मतभेद हो गया। जहा मान्यवर कांशीराम ने, राजनीति को महत्व दिया कि राजनीतिक सत्ता समस्त सामाजिक प्रगति की कुंजी है। वही खापर्डे साहब और मान्यवर कांशीराम साहब के कुछ अन्य साथी इस सोच के थे कि पहले सामाजिक आन्दोलन को इतना सशक्त बनाया जाये कि उसकी परिणति, जो निश्चित रूप से व्यवस्था परिवर्तन है, को रोका न जा सके। इसके बाद मान्यवर जहां आजीवन राजनीति के क्षेत्र मे सक्रिय रहें वही खापर्डे साहब अपने जीवन के अंतिम क्षणो तक सामाजिक आंदोलन को स्थापित करने और उसे मजबूत करने के प्रति आजीवन समर्पित रहे। यद्द्पि कि दोनों आंदोलनो का उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन है।

 

खापर्डे साहब के सामाजिक आंदोलन के महत्व को बाबा साहब के कथन से समझ सकते है जैसा कि बाबा साहब ने कहा है कि “राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और एक समाज सुधारक जो सामाजिक अत्याचार को चुनौती देता है वो राजनीतिक अत्याचार करने वाली सरकार को चुनौती देने वाले राजनीतिज्ञ से कहीं अधिक साहसी हैं -Political tyranny is nothing compared to the social tyranny and a reformer who defies society is a more courageous man than a politician who defies Government.”
यशकाई डी. के. खापर्डे ने 1987 मे अपने समान विचारधाराओं के साथियों के साथ व्यवस्था परिवर्तन के उद्देश्य को लेकर को स्वतन्त्र रूप से बामसेफ को चलाने की योजना बनायीं और उन्होंने डिफेन्स की अपनी नौकरी से रिजाइन कर दिया। तब से, उन्होंने अपना पूरा समय संगठन को दिया और उनके नेतृत्व में देश के कोने-कोने में कैडर केम्प आयोजित किये गए और संगठन के लिए काम करने वाले कार्य-कर्ता का एक बड़ा नेट वर्क तैयार किया। मैंने भी 1998 मे उनका दो दिवसीय कैडर कैंप जो वाराणसी शहर मे आयोजित किया था मे सहभाग लिया। लोग पूछते थे कि बामसेफ ने क्या किया तो खापर्डे साहेब का उत्तर था कि “ऐसा मानव संसाधन तैयार करना जो की फुले-आंबेडकर की विचार धारा के अनुरूप सोच सके, अपने आप मे रिवोलुसन है और बामसेफ यही कार्य अपने स्थापना काल से सफलता पूर्वक कर रहा है और देश मे बहुत से लोगो को तैयार किया है जो आज समाज जीवन मे घटने वाली दिन-प्रतिदिन की घटनाओ की व्याख्या फुले-अंबेडकरी विचारधारा से कर रहें है।“ नि;संदेह, बामसेफ ने सामाजिक आन्दोलन की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है और खास कर नौकरी-पेशा एससी, एसटी, ओबीसी, और इनसे धर्मांतरित अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारी-अधिकारीयों को पे बैक टू सोसायटी के लिए एक मंच दिया है। बाबा साहेब डा. आंबेडकर ने इन नौकरी-पेशा लोगों से जो अपेक्षा की थी, उस अपेक्षा पर यह संगठन काम रहा है और इसके लिए खापर्डे साहेब का योगदान महान है और निश्चय ही स्मरणीय है।
व्यवस्था परिवर्तन के बारे मे खापर्डे साहब ने 1996 मे बामसेफ के 13वे राष्ट्रीय अधिवेशन मे बोलते हुये बताया कि “व्यवस्था परिवर्तन का मतलब क्या है? व्यवस्था परिवर्तन मतलब देश की सत्ता संरचना मे बदलाव। सत्ता संरचना का स्वरूप न बदलने से व्यवस्था परिवर्तन नहीं हो रहा है। यह सब कैसे होगा? इसके लिए सबसे जरूरी है सामाजिक परिवर्तन, उसके बाद राजनीतिक परिवर्तन और अंत मे व्यवस्था परिवर्तन। यही व्यवस्था परिवर्तन का क्रम है। सामाजिक परिवर्तन का मतलब है जिन शोषित और शासित जातियो को व्यवस्था परिवर्तन चाहिए उनमे आपसी संबंधो का पुनर्निर्धारण और पुनर्स्थापना करना। ब्राह्मण-वाद एक व्यवस्था है और उसकी एक विचार धारा है, जिसके आधार पर यह व्यवस्था खड़ी है। अतः ब्राह्मण-वाद की व्यवस्था को बदलना है तो अपने लोगो कि विचार धारा बदलनी होगी। ब्राह्मण-वादी विचार धारा के अनुसार शोषित एवं शासित जातियो के आपसी संबंध आज निर्धारित है। इसका आधार है क्रमिक असमानता। जब तक इन शोषित एवं शासित जातियो के आपसी संबंधो मे, जो क्रमिक असमानता के आधार पर बने हुये है, बदलाव लाकर यह संबंध समानता के आधार पर स्थापित नहीं होते तब तक सामाजिक परिवर्तन नहीं हो सकता। और जब तक सामाजिक परिवर्तन नहीं होगा तब तक राजनीतिक परिवर्तन नहीं होगा। क्योकि इस गैरबरबरी की वजह से शोषितो एवं शासितो का राजनीतिक आचरण अलग-अलग और कभी-कभी तो परस्पर विरोधी होता है। इस आपसी सामाजिक संबंधो के पुनर्निर्धारण और पुनर्स्थापना से शोषित एवं शासित जातियां एक समाज के रूप मे उभर पाएँगी और तब इंका राजनीतिक आचरण एक जैसा होगा। इससे राजनीतिक परिवर्तन होगा और इसके उपयोग एवं प्रयोग से व्यवस्था परिवर्तन होगा।
व्यवस्था परिवर्तन के लिए चार पूर्व शर्ते है। जब तक यह पूर्व शर्ते पूरी नहीं होती व्यवस्था परिवर्तन मुमकिन नहीं है। सबसे पहली पूर्व शर्त है जिन शोषित और शासित जातियो को व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत है उनका एक समान उद्देश्य (Common Objective) होना। आज उनका समान उद्देश्य नहीं है, यह एक कड़वी सच्चाई है। दूसरी पूर्व शर्त है एक विचारधारा (Common Ideology) और यह विचारधारा गांधीवाद, लोहिया वाद, साम्यवाद या मार्क्स वाद नहीं हो सकती है। केवल फुले-अंबेडकरवाद ही हो सकती है। शोषित और शासित जातियो की अभी देश मे एक विचारधारा बनी नहीं है लेकिन बनने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। इन जातियो को हर हाल मे फुले-अंबेडकरवाद की विचारधारा पर लाना होगा। तीसरी पूर्व शर्त है इन जतियों मे लीडरशिप निर्माण करना। इसमे भी जो जतियां ज्यादा पिछड़ी है, अत्याधिक पिछड़ी है जैसे कि अनुसूचित जतियां/ जनजतियां और MBC(Most Backward Caste-अति पिछड़े वर्ग) मे नेतृत्व का निर्माण करना। आज इस समाज मे बहुत से नेता है लेकिन वे व्यवस्था परिवर्तन के लिए कार्यरत नहीं है। और आखिरी शर्त है अनुसूचित जतियों जतियों और अन्य पिछड़े वर्ग का ध्रुवीकरण। एससी (SC) और ओबीसी(OBC) के ध्रुवीकरण का शेष शोषित और शासित जातियो पर जैसे जनजातियों आदि पर असर होता है और वह जातियाँ इस ध्रुवीकरण मे शामिल हो जाती है धर्मांतरित अल्पसंख्यक लोग भी इस ध्रुवीकरण से न केवल प्रभावित होते है बल्कि उनकी यह मांग भी है। इस ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा परिणाम सत्ता संरचना पर होता है। जो शोषक और शासक जातियाँ आज सत्ता संरचना को नियंत्रित कर रही है इस ध्रुवीकरण से सत्ता संरचना पर से उनका नियंत्रण हट जाता है। और सत्ता संरचना पर शोषित और शासित जातियो का नियंत्रण स्थापित हो जाता है। सत्ता संरचना समाज संरचना का प्रतिबिंब मात्र है।“
आज राजनीतिक सत्ता मे बड़े पैमाने पर ओबीसी के लोग आयें है लेकिन फिर भी व्यवस्था परिवर्तन नहीं हो रहा है क्योकि इस राजनीतिक सत्ता का प्रयोग व्यवस्था बदलने के लिए नहीं बल्कि उसे कायम रखने के लिए ही किया जा रहा है। खापर्डे साहब का मानना था कि विचार में परिवर्तन हुए बिना आचरण में परिवर्तन संभव नहीं है और यदि विचार में परिवर्तन नहीं होता है तो हमारा आदमी भी यदि पोजीसन ऑफ़ पावर पर पहुचता है तो वह ब्राह्मणवादी एजेंडा को ही आगे बढ़ाने में लगा रहता है.
खापर्डे साहब ने कार्य कर्ताओ के बारे मे बोलते हुये बताया कि कार्य कर्ताओ का जीवन खुले आईने की तरह स्वच्छ/ट्रांस्परेंट होना चाहिए और उनमे सामूहिक चरित्र का निर्माण होंना चाहिए। अगर अपना आचरण हम छुपाने का प्रयास करते है तो हमारे आस-पास के लोग उतने ही अधिक तेज स्वरूप से हमारे अंदर झाकने का प्रयास करते है। इस लिए कर्ताओ का जीवन खुले आईने की तरह साफ होना चाहिए। खापर्डे साहब ने बताया कि फुले-अंबेडकरी विचारधारा का प्रचार प्रसार करने मे तीन बांते आवस्यक होती है;
1- बौद्धिक योग्यता 2- ईमानदारी 3- सामाजिक प्रतिबद्धता
उनका यह भी कहना था कि अच्छे विचार, अच्छे गुण और अच्छा चरित्र यह तीन बांते जो लोग खुद मे निर्माण करेंगे वही लोग आंदोलन को चला संकेंगे। आदमी के काबिल होने के साथ उसका ईमानदार होना भी जरूरी है। बेईमान आदमी कितना भी होशियार हो पर कभी-न कभी तो धोखा कर ही देता है।
खापर्डे साहब ने संगठन मे अपने को आगे बढ़ाने कि बजाय योग्य और सक्षम कार्यकर्ताओ को आगे बढ़ाया और उनके नेतृत्व मे खुद एक कार्य करता बन कर पूरे लगन, मेहनत और ईमानदारी के साथ कार्य किया। बामसेफ और उसके सहयोगी सभी संगठन केवल मेरे ही नेतृत्व या नियंत्रण मे चले ऐसा कुत्सित प्रयास उन्होने कभी नहीं किया। संगठन मे व्यक्तिवाद के स्थान पर संस्थागत समूहिक नेत्रत्व मे उनका विश्वास था। बामसेफ संगठन खापर्डे साहब के जन्म दिवस 13 मई 1939 को याद करते हुये उनके मिसन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा लेता है और उनको श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

 

सौजन्य : आन्द भीम

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