भारत को सभ्य बनाने का एकमात्र तरीका

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दलितों और शूद्रों (ओबीसी) को बौद्ध बन जाने की सलाह पर मजेदार प्रतिक्रियाएं आती हैं. खुद दलित शूद्र या आदिवासी इस सलाह का विरोध नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि वे किस नर्क में जी रहे हैं और इस नर्क से आजादी का क्या मतलब है.

लेकिन हिन्दुओं और खासकर ब्राह्मण मित्रों और गहन धार्मिक जीवन जीने वाले मित्रों की तरफ से अक्सर सलाह आती है कि सभी धर्म एक से हैं धर्म न बदलो बल्कि इंसान बनो या नास्तिक बनो.

ये सलाह अक्सर अच्छे मन से सौहार्द्रपूर्ण ढंग से करुणा या मित्रता की मुद्रा में ही दी जाती है. लेकिन मैं पूरी विनम्रता और सम्मान के साथ इन सलाहों को नकारता हूँ. अपने दलित शूद्र आदिवासी भाइयों से निवेदन करूंगा की वे इस सलाह में छुपी भूल और षड्यंत्र को समझें और ऐसी सलाह और सलाहकारों से बचकर रहें.

ऐसे सलाहकार मित्र सलाह देते हैं कि धर्म परिवर्तन न करके इसी धर्म और समाज में रहकर इसे बदलो. लेकिन ये असंभव है क्योंकि शूद्रों और दलितों की तरफ से धर्म या समाज में सुधार के किसी भी प्रयास का स्वागत नहीं होगा. क्योंकि दलितों आदिवासियों को हिन्दू माना ही नहीं गया है. अब जिन्हें हिन्दू ही नहीं माना जाता वे हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज में कैसे सुधार करेंगे? क्या कोई मुसलमान या पारसी हिन्दू धर्म में सुधार कर सकता है?

क्या कोई हिन्दू इसाई धर्म में सुधार कर सकता है? उसी तरह दलित भी हिन्दू धर्म को नहीं सुधार सकता. वो केवल हिन्दू धर्म को छोड़ सकता है.

इन सलाहों में एक भयानक षड्यंत्र भी छिपा है. ये सलाहकार कहते हैं खालिस इंसान या नास्तिक बन जाओ. ऊपर ऊपर ये अच्छी लगती है. लेकिन इस सलाह में भयानक शातिर षड्यंत्र छिपा है. एक गरीब कौम कभी भी नास्तिक नहीं बन सकती. उसे कोई न कोई महापुरुष शास्त्र या धर्म चाहिए. आप नास्तिकता पर जोर देंगे तो ये गरीब नास्तिक होने का साहस और बुद्धि तो अर्जित नहीं कर पायेंगे लेकिन धर्म के सबसे घटिया रूपों के गुलाम जरुर हो जायेंगे.

साम्यवादी नास्तिकता ने भारत में धेले भर का भी प्रभाव नहीं पैदा किया है. उनकी वजह से लोग नास्तिक तो नहीं बने बल्कि कथाकार और प्रवचनकार बलात्कारी बाबाओं के गुलाम जरुर बनते गये हैैं.

धर्म की बहस को “धर्म अफीम है” कहकर सीधे नकारने से कोई फायदा नहीं होता, उलटा नुक्सान ही होता है. अगर समझदार वर्ग धर्म की बहस से बाहर निकल जाए तो फिर धर्म में मूर्खों और पोंगा पंडितों का ही राज चलता है. इसमें समझदारों की ही गलती है, मूर्ख पोंगा पंडित तो इसका लाभ उठायंगे ही उनकी क्या गलती है, उनका काम ही यही है. आँख खोलकर देखिये भारत में यही हो रहा है.

धर्म को अफीम मानते हुए भी समझदारों को इस अफीम की वादी में घुसकर इसे साफ़ करना होगा. यही बौद्ध धर्म का प्रयास है. यही बुद्ध अंबेडकर और कृष्णमूर्ति की शिक्षा है.

नाले को साफ़ करने के लिए आपको नाले में घुसना होता है.

अफीम के खेत में घुसकर अफीम को साफ़ करने का तरीका बौद्ध धर्म है, कोरा साम्यवादी चिंतन या नास्तिकता इस खेत से पलायन सिखाता है. इस पलायन से ये खेत और ये खेती खत्म नहीं होती बल्कि इसे मिलने वाली चुनौती ही खत्म हो जाती है. हकीकत ये है कि लोगों को धर्म के नुक्सान से अवगत कराये बिना उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता.

वामपंथी चैम्पियन खुद अपने ब्राह्मणी कर्मकांड पूरे विधि विधान से करते हैं. बंगाल और केरल में वामपंथी मित्रों की शादियों और मृत्यु के कर्मकांड देख लीजिये आपको सब समझ में आ जायेगा.

दलितों शूद्रों को खालिस इंसान या नास्तिक बनने की सलाह देने से पहले इस देश के संपन्न वर्ग को नास्तिक बनाकर देखिये, वो कभी नहीं बनेगा. नास्तिकता की सलाह देने वालों के घरों में झांककर देखिये वे सामान्य से भी बड़े कर्मकांडी अन्धविश्वासी और भक्त निकलेंगे.

दलित आदिवासी और शूद्रों को नास्तिक नहीं बल्कि बौद्ध बनना है. ये नोट करके रखिये मित्रों. औपचारिक धर्म परिवर्तन की अभी आवश्यकता नहीं अभी सिर्फ व्यवहार और आचरण में बौद्ध हो जाइए बाद में अनुकूल समय पर विशाल संख्या में परिवर्तन होना ही है. इससे बड़ी कोई क्रान्ति नहीं. भारत को सभ्य बनाने का यही एक तरीका है.

 

लेखक: संजय जोठे

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