शिवाजी महाराज का ब्राह्मणीकरण

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भारत में प्रस्थापित वर्चस्ववादी शक्तियों का हर कार्य चौर्यकर्म, पाखंड, साजिशे, और झूठ से लथपथ होता है. कोई उन्हें वैचारिक, सांस्कृतिक चुनौती दे तो वे पहले तो उसका इतिहास मिटाने की कोशिशे करेंगे, इसमें अगर सफलता न मिले तो वे उस व्यक्ति का इतिहासही पूरी तरह से विकृत कर देंगे और उसकि विचारधारा इनसे मेल खाती है अपितु वह व्यक्ति इन्हिके बताये नक़्शे क़दमों पे चला था यह बताने के लिए न जाने कितने बेईमान सृजन करेंगे. जब जब  इस देश में कोई क्रांति का आगाज कर गया, इनकी व्यवस्था को ललकार गया, या जो भी बात लोकप्रिय है,  करोड़ों लोग जिस बात को मानते हैं उसका ब्राह्मणीकरण किया जाए, यह उनकी रणनीति है. और इसी रणनीति के तहत इन्होने भारतीय इतिहास के एक महान राजा छत्रपति शिवाजी महाराज को भी अपना शिकार बनाया है.

छत्रपति शिवाजी महाराज ने जो ‘‘स्वराज्य’’ स्थापित किया  वह ‘स्वराज्य’ सामान्यजनों (रयत) का राज्य था. सामान्यजन इस शब्द का अर्थ होता है जाति एवं धर्म से परे सामान्य जनता. अपने कुशल प्रशासन और लोकोपयोगी नीतियों के चलते शिवाजी महाराज जनमानस में अल्पावधि में ही बहुत लोकप्रिय हो चुके थे. उन्होंने  ने जब देखा कि छत्रपति शिवाजी महाराज बहुजन समाज में बहुत लोकप्रिय हैं इसलिए उनकी लोकप्रियता का फायदा उठाने  के लिए उन्होंने ने प्रचार शुरू कर दिया कि शिवाजी महाराज हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लड़े, वे गो-ब्राह्मण प्रतिपालक राजा थे. ‘गो-ब्राह्मण प्रतिपालक’ का अर्थ है, शिवाजी महाराज के पास गाय और ब्राह्मणों की रक्षा करने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं था, ऐसा वे पाखंडी सूचित करना चाहते हैं.

 इसी तारतम्य में बामसेफ के राष्ट्रिय अध्यक्ष वामन मेश्रामजी बड़ीही सटीक टिपण्णी करते है कि,” शिवाजी महाराज के ५० वर्षों के इतिहास में क्या शिवाजी महाराज केवल गाय और ब्राह्मण की रक्षा करने का काम करते रहे, जिस के लिये उन्हे गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक कहा जाता है, वास्तव में शिवाजी महाराज के इतिहास में गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक इस शब्द का कहीं पर भी उल्लेख नही है, तो फिर ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज को कब से गौ प्रतिपालक बनाया? जब गांधी की हत्या हुई और पश्‍चिम महाराष्ट्र में मराठा और अन्य ओबीसी की जातियों ने ब्राह्मणों के घर-बार जलाये और ब्राह्मणों को लूटा तब से ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज का गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक ऐसा प्रचार किया. उन्होने मराठों से सवाल किया की शिवाजी महाराज ब्राह्मणों के प्रतिपालक थे और तुम उनके घर क्यों जलाते हो? इस तरह बहुजन समाज में ब्राह्मण विरोध की धार को बेधार बनाने के लिये ब्राह्मणों ने ऐसा कु-प्रचार शुरु किया फिर उन्होने मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों को यह कहा की शिवाजी गाय की रक्षा करते थे और मुसलमान गाय काटकर खाते हैं इसलिये गाय की रक्षा करना है तो मुसलमान के खिलाफ लड़ना होगा, और यह काम शिवाजी महाराज को देवता मानने वाले लोगों को करना चाहिये. इस तरह मूलनिवासी बहुजनों में मुस्लिम द्वेष फैलाने के लिये इस तंत्र का इस्तेमाल किया. इसलिये मैं जब कहता हूं कि, शिवाजी महाराज के ब्राह्मणीकरण के माध्यम से मूलनिवासी बहुजन समाज का ब्राह्मणीकरण हुआ है, इसका मतलब यह है कि शिवाजी महाराज के जीवन का मुस्लिम विरोधी चित्र तैयार किया गया और इस चित्र का बहुजन समाज में प्रचार और प्रसार किया गया. जैसे ही मूलनिवासी बहुजन समाज का नेता कोई ब्राहमण बन जाता है अथवा कोई उच्चवर्गीय ठाकरे बन जाता है और बहुजन समाज उसे कबूल करता है तो ब्राह्मण उसका इस्तेमाल करते हैं.”

यदि शिवाजी महाराज मुसलमान धर्म के खिलाफ लड़ रहे थे तो कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी नाम के ब्राह्मण ने उनपर हमला क्यों किया? यह ब्राह्मण अफजल खान के साथ क्या कर रहा था?  यदि यह धर्म की लड़ाई थी तो कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी शिवाजी महाराजके साथ होना चाहिये था, इसके बजाय वह अफजल खान का साथ दे रहा था, इससे यह साबित होता है कि शिवाजी महाराज का संघर्ष धर्म युध्द नही था. यदि छत्रपति शिवाजी महाराज हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए मुगलों के साथ लड़ाई लड़ रहे थे, तो उस समय शिवाजी महाराज की सेना में जो 37 प्रतिशत मुस्लिम सिपाही थे, वें शिवाजी महाराज की सेना में रह कर क्या केवल नमाज अदा कर रहे थे? क्या वे लड़ाई में शामील नहीं होते थे?  मुसलमान सिपाही न केवल लड़ाई में सामील होते थे बल्कि मुगलों की सेना के साथ लड़ाई भी लड़ते थे. इसका मतलब ब्राह्मणों द्वारा जो बताया जाता है कि शिवाजी महाराज हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए मुगलों के साथ लड़ाई करते थे, यह बात झूठ साबित होती है.

वे पाखंडी  कहते हैं कि शिवाजी महाराज की माता जिजाबाई शिवाजी महाराज को अच्छे संस्कार के लिए रामायण, महाभारत के सबक सिखाती थी. शिवाजी महाराज शूद्र थे, राज्याभिषेक के समय गागाभट्ट ने उन्हें क्षत्रिय बनाया और शूद्र को धर्म ग्रन्थ पढ़ने  की अनुमति नहीं थी तब जिजाबाई शिवाजी महाराज को रामायण, महाभारत का सबक कैसे दे सकती थी?

 रामदास को शिवाजी महाराजका गुरु बतलाया गया है यह भी झूठ है, शिवाजी महाराज को राज्य स्थापना की प्रेरणा रामदास ने दी है, ऐसा प्रचार भी गलत है, शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक जब वे ४२ वर्ष के थे तब हुआ और उनकी रामदास के साथ मुलाकात ४६ वें वर्ष में हुई, तो रामदास ने राज्य स्थापना की शिवाजी महाराज को कैसे प्रेरणा दी? सवाल है ब्राह्मणों ने रामदास स्वामी को शिवाजी महाराज का गुरु क्यों बताया? इसलिए की जब तक रामदास को शिवाजी महाराज का गुरु नही बनाया जाता, तब तक ऐसा प्रचार नही किया जा सकता कि इस गुरु द्वारा ही शिवाजी को “हिन्दू स्वराज्य’ के स्थापना की प्रेरणा मिली थी. वास्तव में हिन्दवी स्वराज्य यह शिवाजी महाराज के समय में अस्तित्व में ही नहीं था, हिन्दवी स्वराज्य, इस शब्द का इस्तेमाल करके यह जताने की कोशिश की जाती है कि शिवाजी महाराज का मुगल-मुसलमान बादशाह के साथ संघर्ष था, वह धर्म संघर्ष था और इस तरह की प्रेरणा शिवाजी महाराज को रामदास स्वामी ने दी यह बतलाने के लिये उन्होंने रामदास को शिवाजी महाराज का गुरु बनाया और इस बात का पुरजोर प्रचार किया. इस तरह ब्राह्मणों ने शिवाजी महाराज के संघर्ष को इस्लाम के विरुध्द संघर्ष बताया यह झूठा प्रचार है.

प्रचार-प्रसार के बगैर परिवर्तन नही हो सकता. इसलिये वे वर्चस्ववादी लोग ब्राह्मणी-प्रबोधन के लिए गलत इतिहास और धारणाओं का प्रचार-प्रसार करते हैं और उसके लिए वे  इतिहास का विकृतीकरण  करते हैं. उनका यह घिनौना कार्य हर दौर में, हर महामानव के लिए जारी है. हमारे सभी नायकों को ब्राह्मणीकरण की विकृति से बचाना होगा, एक नई सांस्कृतिक लड़ाई के लिए सभी को फिरसे तैयार रहना होगा.

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