संविधान ही धर्मग्रन्थ है: एक षड्यंत्र

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नि:संदेह भारतीय संविधान दुनियाभर में उसकी मूलधारणाएं और उच्च आदर्शों की बदौलत उच्च कोटि का माना जाता है. कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा जब यह कहा गया कि भारतीय संविधान को एक धर्म का दर्जा दे उसका पालन सही ढंग से किया जाये तो सारी समस्याए ख़त्म हो जाएगी. ऊपर से दिखने में यह बयान बहुत उम्दा और सराहनीय लगता है. बहुत लोग जो संविधान के प्रति श्रद्धा रखते है और खासकर बाबासाहेब आंबेडकर को माननेवाले लोग तो ख़ुशी से झूम उठे. लाखों लोगों ने उस बयान की न्यूज़ पेपर कटिंग को पुरे सोशल मीडिया में घुमाया. लेकिन क्या संविधान को धर्मग्रन्थ का दर्जा देना ऊचित होगा? आइए, संविधान और उसके निर्माता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को एकसाथ जोड़कर इस षड्यंत्र को उजागर करे;

  • बाबासाहब ने जब हिंदू धर्म त्यागने का निर्णय लिया तब उन्होंने किसी धर्म को न चुनकर धम्म का चुनाव किया. धम्म और धर्म में जमीन आसमान का अंतर है जिसे खुद बाबासाहब ने अपनी पुस्तक बुद्ध और उसका धम्म में उधृत किया है. धर्म इश्वर और मनुष्य के संबंधों कि बात करता है तो दूसरी तरफ धम्म मनुष्य और मनुष्य के दरम्यान के रिश्तों का दिशानिर्देशन करता है. यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि बाबासाहब ने न केवल हिंदू धर्म को नकारा बल्कि उन्होंने पूरी कि पूरी धर्मव्यवस्था को ही नकार दिया था. इस स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या धर्मव्यवस्था को नकारने वाले आंबेडकर किसी धर्मग्रन्थ का निर्माण कर सकते है?
  • बाबासाहब ने मानवजाती को जो धम्म का रास्ता दिखाया उसका विस्तृत मार्गदर्शन उन्होंने अपनी पुस्तक बुद्ध और उसका धम्म में किया है. ज्ञात रहे न तो संविधान और न ही बुद्ध और उसका धर्म, दोनों में से कोई भी धर्मग्रन्थ नहीं है.
  • भारत देश की राज्यव्यवस्था चलाने का दिशानिर्देशन संविधान करता है तो बुद्ध और उसका धम्म मनुष्य को जीवन जीने का मसौदा प्रदान करता है. यहाँ ध्यान देने योग्य है कि बुद्ध और उसका धम्म इस ग्रंथ की रचना डॉ.बाबासाहब आंबेडकर द्वारा संविधान निर्माण के बाद कि गई. बाबासाहब के अनुसार ‘धर्म’ समाज की धारणा का निर्देशन करता है, ‘संविधान’ शासन एवं शासनपद्धति का तो ‘धम्म’ मानवता और जीवनपद्धती का निर्देशन करता है.
  • अपनी इसी पथदर्शक पुस्तक के चतुर्थ खंड में बाबासाहब विस्तारपूर्वक बताते है कि समाज को तिन विकल्पों में से किसी एक का चुनाव करना ही पड़ता है. पहला ये कि समाज अपने अनुशासन के लिए धम्म का चुनाव न करे. इस प्रकार अनुशासन रहित स्थिति में वह समाज अराजकता कि ओर बढ़ेगा. अगर यह बिकल्प समाज ने स्वयं चुना है तो इसका यही अर्थ निकलेगा कि वह समाज स्वयं अराजकता कि स्थिति में जाना चाहता है. दूसरा विकल्प यह है कि समाज पुलिस अर्थात डिक्टेटर को अनुशासन के लिए चुने. तीसरा विकल्प के तौर पर समाज डिक्टेटर और धम्म दोनों को चुने. जितनी मात्रा में समाज धम्म का पालन करे उतनी मात्रा में धम्म तथा जहा समाज धम्म का पालन न करे वहा पुलिस अर्थात शासनपद्धति. आगे बाबासाहब कहते है कि न तो अराजकता में स्वतंत्रता है और न ही डिक्टेटरशिप में, केवल और केबल तीसरी व्यवस्था में ही स्वतंत्रता है.

अब समझना आवश्यक है कि बाबासाहब ने भी तीसरा ही विकल्प चुना है. समाज में निति और व्यक्ति स्वतंत्रता बनी रहे इसलिए उन्होंने बुद्ध के रूप में “धम्म” दिया और यही स्वतंत्रता अनिर्बंध न हो इसलिए उन्होंने “संविधान” भी दिया.

जब धर्म, शासन और धम्म यह तीनों पद्धतिया इतनी पृथक है तो फिर संविधान किसी देश का धर्म कैसे हो सकता है? कही ऐसा तो नहीं कि नये दौर में बुद्ध द्वारा बारबार सनातनी व्यवस्था को दी जा रही चुनौतियों से डरकर, बुद्ध के साथ होनेवाली सांस्कृतिक लड़ाई से दूर भागने के लिये कोई रणनीति बनायीं जा रही हो? या फिर हिंदू जीवनप्रणाली त्यागने का साहस न होने के चलते, हिदू धर्म के दायरे में ही रहने का यह महज एक युक्तिवाद हो?

सनातनी परंपराओं की गहरी खाई में फंसे हुए लोगों के लिए संविधान एक सुलभ विकल्प है क्यूंकि उसी के सहारे वे हिंदू धर्मव्यवस्था को बरक़रार रखने एवं आनेवाले समय में निश्चित तौर पर होनेवाली धम्म क्रांति से एक बड़ी आबादी को दूर रखने का प्रयास कर सकते है.

(साभार: सतीश बनसोडे)

हिंदी अनुवाद: अविनाश दाभाडे

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