सत्ताप्राप्ति की व्यूहरचना

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यूरोपीय देशों में घटित क्रांतियों के सही आकलन कर देखा जा सकता है कि वह क्रान्तिया धर्मसत्ता, राज्यसत्ता और आर्थिक सत्ता  इन तीन पड़ावों से होकर गुजरी है. उपरोक्त तीनों पड़ाव स्पष्ट रूप में एकदूसरे से भिन्न रहे है तथा हर दुसरे पड़ाव पर पहुँचने के लिए यूरोप में उससे पहले पड़ाव को ध्वस्त किया गया था.

लेकिन भारत के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि उपरोक्त तीनों पड़ावों का यहाँ सहअस्तित्व है. विशेष रूप से धर्मसत्ता को यहाँ हमेशा ही वरीयता प्राप्त है.गौरतलब है कि राज्यसत्ता और अर्थसत्ता में महारत हासिल कर चुके अंग्रेजों ने भी सन १८५७ के बाद यहाँ अपनी सत्ता की मजबूती बनाये रखने हेतु भारतीय धर्मव्यवस्था में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया था. कितना परफेक्ट था अंग्रेजों का भारतीय आकलन! डॉ. आंबेडकर ने भी अंग्रेजों कि आलोचना कर कहा था कि “यहाँ कि परंपरागत व्यवस्था को अंग्रेजों ने सहमती दी है तथा इस व्यवस्था द्वारा हो सकने वाले  विरोध के डर से अंग्रेज हमारी समस्याओं को अनदेखी कर रहे है.” विरोध करनेवाली व्यवस्था के संबंध में डॉ. आंबेडकर का इशारा धर्मव्यवस्था की तरफ था. और इस विरोध का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ जनतांत्रिक राज्यसत्ता  के माध्यम से ही किया जा सकता है यह उनका दृढ़ विश्वास था. धर्मसत्ता कि समाज पर चलनेवाली अनिर्बंध हुकूमत को नेस्तनाबूत करने के लिए राज्यसत्ता मदतगार होती है ऐसा डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट दृष्टिकोण था.

सत्ता का आकलन दो प्रकार से किया जाता है, एक है power over मतलब दूसरों पर उनकी मर्जी के खिलाफ भी नियंत्रण करने का अधिकार  और दूसरा है power to मतलब कुछ करने का अधिकार. डॉ.आंबेडकर का आकलन power to वाला आकलन है. मतलब उनका आकलन सामाजिक है. विषमता, गुलामी नष्ट कर समानता, बंधुता, न्याय की प्रस्थापना हेतु धर्मसत्ता में हस्तक्षेप करना डॉ. आंबेडकर की राज्यसत्ता का उद्देश्य है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की ब्लू प्रिंट में भी डॉ. आंबेडकर लोकतंत्र का महत्व अधोरेखित कर विषमतारहित समाज, नीतिमान समाज एवं विवेकाधिष्टित समाज के आधुनिक मूल्यों पर आधारित नवनिर्माण का संकल्प लेते है.

डॉ. आंबेडकर द्वारा राज्यसत्ता प्राप्ति के दो सूत्र विशेष रूप से प्रचलन में है एक वो जो कांशीरामजी ने बखूबी लोकप्रिय किया कि “जाओ और अपनी घर की दीवारों पर लिखकर रखो कि हमें राज्यकर्ती जमात बनना है”. और दूसरा जो बुध्दिजीवियों में ज्यादा लोकप्रिय है कि “राज्यक्रांति कि पहली शर्त प्रबोधन क्रांति है.”

उपरोक्त दो सूत्र लिए डॉ.आंबेडकर के अनुयायी आगे बढ़ रहे है. यहाँ तक कि धार्मिक आन्दोलन चलाने वाले भी इसी सूत्र का अवलंबन करते दिखाई देते है. धम्म प्रसार करना हो तो पहले राज्यसत्ता काबिज करना आवश्यक है. जैसे बुध्द धम्म का प्रसार  सम्राट अशोका द्वारा सर्वाधिक किया गया. समकालीन दौर में इसका उदाहरण बहन मायावती के रूप में दिखाई देता है जिन्होंने धम्मक्रांति की ५० वी वर्षगांठ पर एलान किया कि पहले राज्यसत्ता और फिर धम्मस्वीकार.

डॉ.आंबेडकर के सिध्दांत और विचारों को हमें कालसापेक्ष दृष्टि से समझना होगा. आज के दौर में सत्ता का प्रारूप विकेन्द्रित हो रहा है. उच्च समझी जानेवाली जातियों के अलावा आज वैश्विकीकरण में प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों की भी  अनदेखी नहीं की जा सकती. माध्यमसत्ता भी बड़े पैमाने में आज सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती दिखाई पड़ती है. टेक्नोलॉजी का मानवीय समाज पर प्रभाव दिनबदिन बढ़ता जा रहा है. भारतीय परिस्थितियों में सांस्कृतिक सत्ता, राज्यसत्ता का अभिन्न अंग है. सत्ता संकल्पना को आज विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना होगा, परिभाषित करना होगा. ज्ञानसत्ता से सांस्कृतिक सत्ता का उद्गम होता है, और सांस्कृतिक सत्ता से आगे प्रवाहित होकर फिर आर्थिकसत्ता का पड़ाव पार कर , राजकीय सत्ता तक पहुंचा जाता है.

इसलिए आज के सन्दर्भ में आंबेडकरी मूवमेंट को सांस्कृतिक सत्ताप्राप्ति की व्यूहरचना तयार करनी होगी. जिसके लिए उसे De- Caste, De-Religious, De-Class कार्यकर्ताओं की फौज का निर्माण करना आवश्यक है. अपनी अपनी जातीयों के झंडे लहराते हुए परिवर्तन लाने की बाते खोकली साबित होगी.

लेखक(मराठी): सतीश बनसोडे

हिंदी अनुवाद: अविनाश दाभाडे

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